Supreme Court का बड़ा फैसला जल्द: राष्ट्रपति और गवर्नर बिल्स पर कब तक करेंगे फैसला? जानिए सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के Highlights | News Heaven

Supreme Cour tने राष्ट्रपति रेफ़रेंस पर सुनवाई पूरी कर ली है और अब जल्द ही ऐतिहासिक राय देगा। सवाल है—क्या राष्ट्रपति और गवर्नर को राज्य विधेयकों पर समयसीमा में फैसला करना होगा? जानिए पूरा मामला, दलीलें और इसका असर भारतीय शासन व्यवस्था पर।

Supreme Court

राष्ट्रपति रेफ़रेंस पर भारत के Supreme Court की संविधान पीठ के पांच जजों ने सुनवाई पूरी की है और अब अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है। यह मामला अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या राष्ट्रपति और गवर्नरों को राज्य सरकारों के बिल्स पर निर्णय लेना चाहिए या नहीं।

19 अगस्त को सुनवाई शुरू हुई और दस दिनों तक चली। सुनवाई आज 11 सितंबर 2025 को समाप्त होने पर कोर्ट ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। अब नवंबर 2025 से पहले फैसला होना चाहिए।


राष्ट्रपति रिफरेंस का क्या अर्थ है?

राष्ट्रपति को किसी भी कानूनी या सार्वजनिक महत्व के मुद्दे पर Supreme Court  से राय लेने का अधिकार संविधान का अनुच्छेद 143(1) में दिया गया है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस मामले में Supreme Court के सामने चौबीस महत्वपूर्ण सवाल रखे, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या न्यायालय समयसीमा निर्धारित कर सकता है जब गवर्नर या राष्ट्रपति राज्य विधेयक पर कार्रवाई करते हैं?


पृष्ठभूमि— तमिलनाडु मुद्दा

अप्रैल 2025 में तमिलनाडु में 10 पेंडिंग बिल्स पर Supreme Court की दो जजों की बेंच ने फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति और गवर्नर को तय समयसीमा में निर्णय लेना चाहिए, वरना बिल्स पारित माना जाएगा।
इस फैसले के बाद आज एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई, जिसका उद्देश्य स्पष्ट करना था कि क्या कोर्ट वास्तव में ऐसा समय तय कर सकता है या नहीं।


केंद्रीय पक्ष

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने कहा:

  • संविधान (अनुच्छेद 200 और 201) समयसीमा नहीं बताता।
  • यदि कोर्ट समयसीमा निर्धारित करता है, तो यह संविधान में बदलाव होगा, जो न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
  • लेकिन न्यायपालिका का हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए, गवर्नर बिल्स को हमेशा पेंडिंग नहीं दे सकते।

राज्य पक्ष

पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और पंजाब ने न्यायालय में दलील दी:

  • कैबिनेट की सलाह को गवर्नर को मानना ही होगा।
  • बिल को एक बार लौटाया जा सकता है, लेकिन फिर से मंज़ूरी देनी होगी।
  • सरकार द्वारा बिल्स को अनिश्चित काल तक रोके रखना संघीय व्यवस्था और लोकतंत्र के खिलाफ है।

बेंच की राय

चीफ जस्टिस बी.आर. गवई सहित अन्य न्यायाधीशों ने कहा:

  • राष्ट्रपति के रेफ़रेंस पर उठाए गए सवालों का ही उनका उत्तर होगा।
  • अप्रैल 2025 का निर्णय दोबारा नहीं लागू होगा।
  • क्या अलग-अलग मामलों में देरी का अर्थ है कि सभी पर एक समान समयसीमा लागू की जाए?

भविष्य में क्या होगा?

  • अगले दो महीने में Supreme Court का फैसला आने की उम्मीद है।
  • यह निर्णय केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन को निर्धारित करेगा।
  • टाइमलाइन निर्धारित होने पर राज्य सरकारों के बिल लंबे समय तक लटके नहीं रहेंगे।

इस मुद्दे का महत्व क्यों है? (5 अंक)

  1. सरकारी दक्षता: राज्य बिल्स पर अनिश्चितकालीन देरी समाप्त हो सकती है।
  2. पावर प्रशासन: कोर्ट और एग्ज़ीक्यूटिव के अधिकारों में स्पष्ट सीमाएँ होंगी।
  3. फेडरलिज़्म: केंद्र और राज्य के रिश्तों पर सीधा असर
  4. निर्देशिका: निर्देश 32 और 131
  5. पॉलिटिकल स्थिरता: चुनी हुई सरकारों और राज्यपालों के बीच मतभेद कम होंगे।

FAQs

Q1. राष्ट्रपति रेफ़रेंस का उद्देश्य क्या है?
राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत Supreme Court से सलाह ली है।

Q2. क्या कोर्ट ने पहले से ही समय तय किया है?
हाँ, तमिलनाडु केस में अप्रैल 2025 में।

Q3.क्या Supreme Court अपने पुराने निर्णय को बदल रहा है?
नहीं, यह जवाब केवल रेफरेंस प्रश्नों पर देगा।

मित्रों, यह सुनवाई भारतीय लोकतंत्र के लिए ऐतिहासिक हो सकती है। अब Supreme Court का अंतिम निर्णय राष्ट्रपति और गवर्नरों के अधिकारों को कैसे स्पष्ट करता है।

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