बॉलीवुड अभिनेता राजपाल यादव ₹9 करोड़ के चेक बाउंस मामले में जेल की सजा काट रहे हैं। क्या पूरी रकम जमा करने पर उन्हें तुरंत रिहाई मिल सकती है? जानिए Section 138 के तहत चेक बाउंस कानून, कोर्ट के नियम और पूरा कानूनी सच।

Rajpal Yadav Cheque Bounce Case: क्या ₹9 करोड़ जमा करने पर मिल सकती है रिहाई?
बॉलीवुड अभिनेता और मशहूर कॉमेडियन राजपाल यादव इन दिनों अपनी फिल्मों की वजह से नहीं, बल्कि एक गंभीर कानूनी मामले के कारण चर्चा में हैं। ₹9 करोड़ के चेक बाउंस केस में उन्हें जेल की सजा सुनाई गई है। ऐसे में लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल है — अगर राजपाल यादव पूरी ₹9 करोड़ की रकम जमा कर दें, तो क्या वे तुरंत जेल से बाहर आ सकते हैं?
आइए इस पूरे मामले और कानूनी नियमों को विस्तार से समझते हैं।
📍 कैसे शुरू हुआ मामला?
यह मामला लगभग 2010 का है, जब राजपाल यादव ने अपनी फिल्म “अता पता लापता” के निर्माण के लिए एक दिल्ली स्थित कंपनी से करीब ₹5 करोड़ का लोन लिया था। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही और अभिनेता पर कर्ज चुकाने का दबाव बढ़ गया।
कर्ज चुकाने के लिए उन्होंने कंपनी को कई चेक जारी किए, लेकिन वे चेक अपर्याप्त धनराशि (Insufficient Funds) के कारण बाउंस हो गए। इसके बाद कंपनी ने Negotiable Instruments Act, 1881 की धारा 138 के तहत मामला दर्ज कराया।
समय के साथ ब्याज और कानूनी खर्च जुड़ने से कुल बकाया राशि बढ़कर लगभग ₹9 करोड़ हो गई।
⚖️ कोर्ट की कार्रवाई और जेल की सजा
लंबी कानूनी सुनवाई के बाद अदालत ने सख्त रुख अपनाया। जब राजपाल यादव तय समय पर भुगतान करने में असफल रहे, तो कोर्ट ने उन्हें हिरासत में लेने का आदेश दिया।
बताया जाता है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने भी उन्हें अतिरिक्त राहत देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उन्हें छह महीने की जेल की सजा सुनाई गई।
💰 क्या ₹9 करोड़ जमा करने पर तुरंत रिहाई संभव है?
यह इस केस का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
✅ समझौता संभव है — लेकिन कोर्ट की मंजूरी जरूरी
अगर राजपाल यादव पूरी ₹9 करोड़ की रकम चुका देते हैं और शिकायतकर्ता (कंपनी) के साथ आपसी समझौता हो जाता है, तो वे अदालत में राहत के लिए आवेदन कर सकते हैं। कोर्ट के पास यह अधिकार है कि:
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सजा को निलंबित या कम करे
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मामले को कंपाउंड (समझौते के आधार पर समाप्त) करे
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जमानत प्रदान करे
लेकिन यह प्रक्रिया स्वतः नहीं होती, इसके लिए अदालत का औपचारिक आदेश आवश्यक है।
❌ केवल भुगतान से सजा खत्म नहीं होती
भले ही पूरी रकम चुका दी जाए, लेकिन जब तक कोर्ट आधिकारिक रूप से आदेश जारी नहीं करता, तब तक जेल की सजा वैध रहती है। इसलिए सिर्फ पैसे जमा करना ही रिहाई की गारंटी नहीं है।
📜 भारत में चेक बाउंस कानून क्या कहता है?
भारत में चेक बाउंस से जुड़े मामले Negotiable Instruments Act, 1881 की धारा 138 के अंतर्गत आते हैं।
प्रक्रिया इस प्रकार है:
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कर्ज चुकाने के लिए चेक जारी किया जाता है।
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बैंक द्वारा चेक अपर्याप्त धनराशि के कारण वापस कर दिया जाता है।
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शिकायतकर्ता 30 दिनों के भीतर कानूनी नोटिस भेजता है।
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आरोपी को 15 दिनों के भीतर भुगतान करने का अवसर दिया जाता है।
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भुगतान न करने पर आपराधिक मामला दर्ज किया जाता है।
🔹 सजा का प्रावधान:
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अधिकतम 2 वर्ष की जेल
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चेक राशि का दोगुना तक जुर्माना
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या दोनों
🏛️ क्या जेल की सजा से कर्ज खत्म हो जाता है?
नहीं।
जेल की सजा काट लेने से वित्तीय देनदारी समाप्त नहीं होती। जब तक आधिकारिक समझौता न हो जाए, शिकायतकर्ता कानूनी रूप से राशि की वसूली जारी रख सकता है।
📊 यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
राजपाल यादव का मामला यह दिखाता है कि:
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वित्तीय मामलों में लापरवाही गंभीर परिणाम ला सकती है
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चेक बाउंस कानून सख्ती से लागू होता है
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कोर्ट की अनुमति के बिना समझौता मान्य नहीं होता
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कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है, चाहे वह आम नागरिक हो या सेलिब्रिटी
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