ईरान और अमेरिका ने ओमान की मध्यस्थता में मस्कट में परमाणु वार्ता दोबारा शुरू की है। बातचीत से कूटनीति की उम्मीद बढ़ी है लेकिन खाड़ी देशों में सुरक्षा और तनाव बढ़ने की आशंका भी गहराई है।

मस्कट में फिर शुरू हुई ईरान-अमेरिका परमाणु वार्ता: ओमान बना मध्यस्थ, खाड़ी देशों में बढ़ी चिंता
मध्य पूर्व में लंबे समय से चल रहे ईरान और अमेरिका के परमाणु विवाद ने एक बार फिर नया मोड़ ले लिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों देशों ने ओमान की राजधानी मस्कट में परमाणु मुद्दे पर बातचीत दोबारा शुरू कर दी है। यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब पूरे क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tension) लगातार बढ़ रहा है और कई देश किसी भी संभावित संघर्ष की आशंका से चिंतित हैं।
इस वार्ता में ओमान ने मध्यस्थ (Mediator) की भूमिका निभाई है। ओमान को लंबे समय से एक ऐसा देश माना जाता है जो ईरान और अमेरिका दोनों के साथ संतुलित रिश्ते रखता है और कठिन परिस्थितियों में बातचीत का रास्ता निकालने में सक्षम है।
क्यों चुना गया मस्कट? ओमान की बढ़ती कूटनीतिक भूमिका
मस्कट, ओमान का प्रमुख शहर, पहले भी कई संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं का केंद्र रहा है। ओमान की खासियत यह है कि वह न तो पूरी तरह किसी एक पक्ष के साथ खड़ा दिखाई देता है और न ही वह किसी क्षेत्रीय विवाद में खुलकर भाग लेता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान और अमेरिका के बीच सीधी बातचीत अक्सर अविश्वास, घरेलू राजनीति और कड़े बयानबाज़ी के कारण असफल हो जाती है। ऐसे में ओमान जैसे देश का मध्यस्थ बनना बातचीत को आगे बढ़ाने में मदद करता है।
ओमान की यह भूमिका यह भी दिखाती है कि वह अब मध्य पूर्व में शांति और कूटनीति के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है।
ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत किस मुद्दे पर हो रही है?
मस्कट में हो रही बातचीत का मुख्य मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम है, खासतौर पर यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) को लेकर।
अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का मानना है कि यदि ईरान ने यूरेनियम संवर्धन को तेजी से आगे बढ़ाया, तो यह भविष्य में परमाणु हथियार विकसित करने की क्षमता प्राप्त कर सकता है। इसी कारण अमेरिका लगातार ईरान से मांग करता रहा है कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करे और अंतरराष्ट्रीय निगरानी को स्वीकार करे।
वहीं, ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है और इसका उपयोग ऊर्जा तथा नागरिक जरूरतों के लिए किया जा रहा है।
रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि ईरान चाहता है कि बातचीत केवल परमाणु मुद्दे तक सीमित रहे, जबकि अमेरिका चाहता है कि चर्चा में ईरान की मिसाइल क्षमता और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे मुद्दे भी शामिल हों।
खाड़ी देशों की चिंता क्यों बढ़ी?
जहां दुनिया के कुछ हिस्सों में इस बातचीत को एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, वहीं खाड़ी देशों (Gulf Nations) में इस घटनाक्रम को लेकर चिंता साफ दिखाई दे रही है।
खाड़ी देशों की चिंता के पीछे दो मुख्य कारण बताए जा रहे हैं:
1. अगर बातचीत विफल हुई तो युद्ध का खतरा बढ़ सकता है
खाड़ी देशों को डर है कि अगर वार्ता असफल हुई, तो अमेरिका और ईरान के बीच टकराव बढ़ सकता है। इस टकराव का असर सीधे खाड़ी क्षेत्र पर पड़ेगा क्योंकि यह इलाका रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है और यहां तेल आपूर्ति से लेकर समुद्री मार्गों तक सब कुछ प्रभावित हो सकता है।
यदि क्षेत्र में सैन्य संघर्ष हुआ, तो इसका प्रभाव केवल राजनीति पर नहीं बल्कि तेल कीमतों, व्यापार और सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
2. अगर समझौता सफल हुआ तो ईरान की ताकत बढ़ सकती है
कुछ खाड़ी देश यह भी मानते हैं कि अगर अमेरिका ईरान पर लगे प्रतिबंधों में राहत देता है, तो ईरान की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और उसे अधिक संसाधन मिलेंगे।
इससे ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ सकता है, जो खाड़ी देशों के लिए रणनीतिक चुनौती बन सकता है। कई देशों को यह डर है कि आर्थिक मजबूती के बाद ईरान अपने सहयोगी समूहों और सैन्य ताकत को और अधिक बढ़ावा दे सकता है।
प्रतिबंध (Sanctions) बने सबसे बड़ा मुद्दा
ईरान-अमेरिका बातचीत में एक महत्वपूर्ण बिंदु है ईरान पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध। अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के कारण ईरान को तेल निर्यात, बैंकिंग और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारी नुकसान हुआ है।
ईरान बार-बार मांग करता रहा है कि प्रतिबंधों में राहत दी जाए, ताकि उसकी अर्थव्यवस्था स्थिर हो सके।
वहीं अमेरिका चाहता है कि प्रतिबंध हटाने से पहले ईरान ठोस गारंटी दे कि वह परमाणु कार्यक्रम को सीमित करेगा और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के लिए तैयार रहेगा।
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने बढ़ाई बातचीत की अहमियत
यह बातचीत ऐसे समय में हो रही है जब मध्य पूर्व में कई बड़े मुद्दे सक्रिय हैं, जैसे:
-
क्षेत्रीय संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता
-
खाड़ी क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों में वृद्धि
-
ईरान समर्थित समूहों और अन्य शक्तियों के बीच बढ़ता तनाव
-
रणनीतिक समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर चिंता
ऐसे में यह परमाणु वार्ता केवल ईरान-अमेरिका के बीच का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसका प्रभाव पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा और स्थिरता पर पड़ सकता है।
क्या ओमान दिला सकता है कोई बड़ी सफलता?
ओमान की मध्यस्थता से उम्मीद तो बनी है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान और अमेरिका के रिश्तों का इतिहास बेहद जटिल रहा है। दोनों देशों के बीच पहले भी कई समझौते हुए, लेकिन राजनीतिक बदलाव और अविश्वास के कारण वे लंबे समय तक टिक नहीं पाए।
फिर भी, यह तथ्य कि दोनों देश बातचीत के लिए तैयार हैं, यह दर्शाता है कि दोनों पक्ष फिलहाल टकराव से बचने की कोशिश कर रहे हैं।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल किसी बड़े समझौते की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन बातचीत जारी रहना अपने आप में एक अहम संकेत है।
यदि वार्ता सफल होती है, तो संभावित परिणाम हो सकते हैं:
-
ईरान के यूरेनियम संवर्धन पर नियंत्रण
-
अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण और निगरानी में वृद्धि
-
ईरान पर कुछ प्रतिबंधों में राहत
-
मध्य पूर्व में युद्ध की आशंका में कमी
लेकिन अगर वार्ता असफल रही, तो यह संकट और अधिक गहरा सकता है और खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ सकता है।
News Heaven निष्कर्ष
मस्कट में शुरू हुई ईरान-अमेरिका परमाणु वार्ता मध्य पूर्व की राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकती है। ओमान की मध्यस्थता से जहां शांति और कूटनीति की उम्मीद जगी है, वहीं खाड़ी देशों में अस्थिरता और सुरक्षा को लेकर डर भी बढ़ गया है।
अब पूरी दुनिया की नजर मस्कट पर टिकी है, क्योंकि इस बातचीत का परिणाम आने वाले समय में मध्य पूर्व की सुरक्षा, तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर सकता है।
Also Read: रहस्य और डर की कहानियों से भरे भारत के ये किले, जिनकी दास्तानें रातों की नींद उड़ा देंगी