विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति की आलोचना करते हुए कहा कि ऐसी नीतियां वैश्विक व्यापार को नुकसान पहुंचाती हैं। उन्होंने भारत की “पड़ोसी पहले” नीति और राष्ट्रीय हितों की रक्षा पर जोर दिया।

जयशंकर ने डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति को बताया वैश्विक व्यापार के लिए हानिकारक
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि यह नीति निष्पक्ष वैश्विक व्यापार के लिए हानिकारक है और इससे मुक्त अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ता है।
जयशंकर ने यह बयान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में आयोजित सम्मेलन “India and the World Order: Preparing for 2047” के दौरान दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जहां “सब कुछ हथियार बनाया जा रहा है” — चाहे वह सप्लाई चेन हो या बैंकिंग सिस्टम।
वैश्विक व्यापार और संरक्षणवाद पर चिंता
जयशंकर ने कहा कि संरक्षणवाद (Protectionism) और ट्रेड बैरियर्स (Trade Barriers) के बढ़ते प्रभाव ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दिशा बदल दी है। अब देश अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए नई रणनीतियाँ बना रहे हैं, ताकि प्रतिस्पर्धा के इस दौर में स्थिरता और शांति बनी रहे।
भारत की ट्रेड नीति: अपनी “रेड लाइन्स” पर कायम
जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत किसी भी हालत में अपनी घरेलू बाज़ार सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा, विशेषकर कृषि, डेयरी और विनिर्माण (manufacturing) जैसे क्षेत्रों में।
उन्होंने कहा — “भारत दुनिया के साथ अपने शर्तों पर जुड़ेगा।”
उन्होंने चेतावनी दी कि अमेरिका के साथ किसी भी व्यापारिक समझौते में भारत की ‘रेड लाइन्स’ का सम्मान किया जाना चाहिए, ताकि सस्ते विदेशी उत्पाद भारतीय बाजार को नुकसान न पहुंचाएं।
यह बयान भारत के लंबे समय से चले आ रहे उस दृष्टिकोण को दोहराता है कि वैश्वीकरण (Globalization) तभी सफल हो सकता है जब वह सभी देशों के लिए निष्पक्ष और समान हो, न कि केवल बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के पक्ष में।
“पड़ोसी पहले” नीति: क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में भारत की सोच
जयशंकर ने अपने भाषण में भारत की “पड़ोसी पहले” (Neighborhood-First) नीति को भी दोहराया। उन्होंने कहा कि भारत अपने पड़ोसी देशों के लिए “गो-टू पार्टनर” बनना चाहता है — चाहे स्थिति राजनीतिक हो, आर्थिक या मानवीय संकट की।
यह रणनीति दक्षिण एशिया में भारत की नेतृत्व भूमिका को मजबूत करती है और यह दिखाती है कि भारत केवल अपने हितों के लिए नहीं, बल्कि क्षेत्रीय विकास और शांति के लिए भी प्रतिबद्ध है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत की विदेश नीति समय के साथ बदल रही है, परंतु इसकी मूल भावना ‘रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy)’ पर आधारित है — यानी वैश्विक दबाव के बजाय राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय लेना।
2047 की ओर भारत की राह और वैश्विक अस्थिरता
जयशंकर ने कहा कि वर्तमान विश्व व्यवस्था में “हर दिन प्रतिस्पर्धा और अस्थिरता बढ़ रही है।”
उन्होंने उदाहरण दिया कि कैसे ट्रेड वॉर (Trade War) और प्रतिबंध (Sanctions) आज के दौर में आर्थिक हथियार बन चुके हैं।
उन्होंने भारत को सलाह दी कि यदि देश को 2047 तक एक वैश्विक शक्ति बनना है, तो उसे अपनी राजनयिक, आर्थिक और रक्षा क्षमताओं को और मजबूत करना होगा।
भारत की आगे की दिशा
जयशंकर के विचारों से यह स्पष्ट होता है कि भारत की कूटनीति संतुलित और स्वाभिमानी है। भारत वैश्विक शक्तियों के साथ सहयोग करना चाहता है, लेकिन अपने राष्ट्रीय हितों की कीमत पर नहीं।
भारत का ध्यान अब आत्मनिर्भरता, निष्पक्ष व्यापार और क्षेत्रीय नेतृत्व पर है — यही रास्ता भारत को 2047 तक वैश्विक नेतृत्व की दिशा में ले जाएगा।
अंतिम विचार (Final Thoughts)
एस. जयशंकर के बयानों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि भारत की विदेश नीति व्यावहारिकता, आत्मसम्मान और क्षेत्रीय स्थिरता पर आधारित है।
उनके शब्दों ने यह संदेश दिया कि भारत सहयोग के लिए तैयार है, लेकिन अपनी आर्थिक सुरक्षा और स्वतंत्र निर्णय क्षमता से समझौता नहीं करेगा।




